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मन घायल तन पागल कर दे

MOHD TASVIRUL ISLAM

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन घायल तन पागल कर दे
        
                                                    
                            
ऐसे प्रेम पिशाच यहां हैं
भावावेश में रहने वाले
कातिल और जल्लाद यहां हैं
मोहपाश में विचरण करते
बातों के उस्ताद यहां हैं
खूब बड़ाई करने वाले
मस्ती के औलाद यहां हैं
मदिरा जिसके मुँह का गहना
कलयुग के य़मराज यहां हैं
कहते खुद को जादुगर जो
धरती के महाराज यहां हैं
प्रेम में भी मतलब ढूँढ लेते
ऐसे सर के ताज यहां हैं
फँस के सीखा हैं ये मैंने
ये मेरे अन्दाज नहीं हैं

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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