मन घायल तन पागल कर दे
ऐसे प्रेम पिशाच यहां हैं
भावावेश में रहने वाले
कातिल और जल्लाद यहां हैं
मोहपाश में विचरण करते
बातों के उस्ताद यहां हैं
खूब बड़ाई करने वाले
मस्ती के औलाद यहां हैं
मदिरा जिसके मुँह का गहना
कलयुग के य़मराज यहां हैं
कहते खुद को जादुगर जो
धरती के महाराज यहां हैं
प्रेम में भी मतलब ढूँढ लेते
ऐसे सर के ताज यहां हैं
फँस के सीखा हैं ये मैंने
ये मेरे अन्दाज नहीं हैं
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X