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कोलाहल

MOHD TASVIRUL ISLAM

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कोलाहल सा मचा रहा है
        
                                                    
                            
त्राहीमाम सा लगा रहा है
मौत भी आँख मिचौली खेल
घर घर रूदन मचा रहा है

अस्पताल मे भीड़ लगी है
शमशान मे लाश सजी है
विपदा ऐसी है इस दुख की
अपनो को ही तोड़ रखी है

घर मे आँसू बाहर आँसू
तकलीफों की होड़ लगी है
सरकारे भी चिर निद्रा मे
बस अपनो को अपनो की पड़ी है

इतना भ्रम संजोया है
मन को डर से डूबोया है
हाये कोरोना कहते कहते
बस अपनो को खोया है

कुछ ऐसा वरदान दो
ना उखड़े सांसे, जीवनदान दो
निर्जन ना हो शरीर ये
ऐसी आत्म शक्ती का मान दो
2 वर्ष पहले
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