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कोलाहल

                
                                                         
                            कोलाहल सा मचा रहा है
                                                                 
                            
त्राहीमाम सा लगा रहा है
मौत भी आँख मिचौली खेल
घर घर रूदन मचा रहा है

अस्पताल मे भीड़ लगी है
शमशान मे लाश सजी है
विपदा ऐसी है इस दुख की
अपनो को ही तोड़ रखी है

घर मे आँसू बाहर आँसू
तकलीफों की होड़ लगी है
सरकारे भी चिर निद्रा मे
बस अपनो को अपनो की पड़ी है

इतना भ्रम संजोया है
मन को डर से डूबोया है
हाये कोरोना कहते कहते
बस अपनो को खोया है

कुछ ऐसा वरदान दो
ना उखड़े सांसे, जीवनदान दो
निर्जन ना हो शरीर ये
ऐसी आत्म शक्ती का मान दो
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2 वर्ष पहले

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