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इक अनकहा सा रिश्ता उम्र भर की कशिश बना गया।

Mohd Shibli

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उम्र की सरहदों पे दिल ये फ़रेब खा गया,
        
                                                    
                            
इक पच्चीस का ख़्वाब इस चालीस को भा गया।

न बात करने की हिम्मत, न दोस्ती का सबब,
बस दूर से ही तकना मेरी तक़दीर में आ गया।

वो सादगी लिबास की, वो सलीक़ा-ए-गुफ़्तगू,
उसका हर इक अंदाज़ मेरे दिल पे छा गया।

लहजे में जैसे बहती हो कोई मीठी नदी,
वो हँस के बोली तो मौसम नया जगा गया।

कभी जो नज़र मिली, वो धीरे से मुस्कुराई,
इक पल का वो तबस्सुम मेरी दुनिया हिला गया।

मैं देखता ही रह गया ख़ामोश, बे-ज़बाँ,
वक़्त का ये फ़ासला मुझको डरा गया।

कहा न कुछ 'शिबली', बस ख़यालों में सँभाला उसे,
इक अनकहा सा रिश्ता उम्र भर की कशिश बना गया।
50 मिनट पहले
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