आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इक अनकहा सा रिश्ता उम्र भर की कशिश बना गया।

                
                                                         
                            उम्र की सरहदों पे दिल ये फ़रेब खा गया,
                                                                 
                            
इक पच्चीस का ख़्वाब इस चालीस को भा गया।

न बात करने की हिम्मत, न दोस्ती का सबब,
बस दूर से ही तकना मेरी तक़दीर में आ गया।

वो सादगी लिबास की, वो सलीक़ा-ए-गुफ़्तगू,
उसका हर इक अंदाज़ मेरे दिल पे छा गया।

लहजे में जैसे बहती हो कोई मीठी नदी,
वो हँस के बोली तो मौसम नया जगा गया।

कभी जो नज़र मिली, वो धीरे से मुस्कुराई,
इक पल का वो तबस्सुम मेरी दुनिया हिला गया।

मैं देखता ही रह गया ख़ामोश, बे-ज़बाँ,
वक़्त का ये फ़ासला मुझको डरा गया।

कहा न कुछ 'शिबली', बस ख़यालों में सँभाला उसे,
इक अनकहा सा रिश्ता उम्र भर की कशिश बना गया।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
36 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर