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कशमकश...

Mohanjeet Kukreja

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहीं ऐसा तो नहीं…
        
                                                    
                            
आँधियों का ना होकर
कुसूर बस हमारा ही हो
जो यूँ ग़र्दे-राह की तरह
हल्के-बेबस से हो कर
उड़ा करते हैं ऐसे अक्सर
जज़्बात की हर रौ में…?!

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले
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Anil Pandey

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