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चेहरा अभी भी माँ का परवर दीगार सा है

MD Shahabuddin

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चेहरे से खुश दिल से सोगंवार सा है
        
                                                    
                            
हर शख्स मोहब्बत मे कुछ बीमार सा है
नाकाबिल समझ के जिसको निकाला है तूने घर से
वही शख्स मेरी कहानी में एक किरदार सा है
बदन पे झुर्रियां की बालो में सफेदी आ तो गयी है
पर चेहरा अभी भी माँ का परवर दीगार सा है

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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