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चेहरा अभी भी माँ का परवर दीगार सा है

                
                                                         
                            चेहरे से खुश दिल से सोगंवार सा है
                                                                 
                            
हर शख्स मोहब्बत मे कुछ बीमार सा है
नाकाबिल समझ के जिसको निकाला है तूने घर से
वही शख्स मेरी कहानी में एक किरदार सा है
बदन पे झुर्रियां की बालो में सफेदी आ तो गयी है
पर चेहरा अभी भी माँ का परवर दीगार सा है

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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