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दिव्य मूरत वो डीप वो बाती मानो सहर्ष सिखलाती है

mayank vajpeyee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मंदिर की घंटी में विस्मित सी शांति है
        
                                                    
                            
ड्योढ़ी स्पर्श मात्र वो नित्य शक्ति दे जाती है
दिव्य मूरत वो डीप वो बाती मानो सहर्ष सिखलाती है
नाथ बैठे सम्मुख तेरे भला फिर कैसे कोई चिता तुझे सताती है
एक घंटा पहले
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