मंदिर की घंटी में विस्मित सी शांति है
ड्योढ़ी स्पर्श मात्र वो नित्य शक्ति दे जाती है
दिव्य मूरत वो डीप वो बाती मानो सहर्ष सिखलाती है
नाथ बैठे सम्मुख तेरे भला फिर कैसे कोई चिता तुझे सताती है
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