जो ये भीड़ चुप सी बैठी है
ऐसा नहीं तुमसे जरा भी इत्तेफाक रखती है
तुम्हारे सच से झाँकता झूठ रोज़ दिखता है उनको
बस रेज़गारी और तरकारी थोड़ा मसरूफ़ रखती है