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बस रेज़गारी और तरकारी थोड़ा मसरूफ़ रखती है

                
                                                         
                            जो ये भीड़ चुप सी बैठी है
                                                                 
                            
ऐसा नहीं तुमसे जरा भी इत्तेफाक रखती है
तुम्हारे सच से झाँकता झूठ रोज़ दिखता है उनको
बस रेज़गारी और तरकारी थोड़ा मसरूफ़ रखती है
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एक घंटा पहले

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