पत्थर को शीशा तोड़ना भी भला कोई सिखलाता है
पर क्या हर पत्थर गुस्से में खिड़की के अंदर घुसा आता है
यूँ तो लाठी को भी खून बहाना कहाँ कोई बतलाता है
पर कोई बाँस सिर बजाये और कोई बाँसुरी बन जाता है
कुछ तो है जो इंसान को भी इंसान से अलग बनाता है
वरना हर कोई थोड़े ही गांधी बन जाता है