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Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सौंदर्यबोध निज मन का
        
                                                    
                            
होता कल्पित रूप
कोई पाषाण को देव समझता
कोई समझता पहाड़ रूप
दृश्य विचारों का न होता
कभी सदृष्य रूप
फिर भी साथ-साथ चलती सृष्टि
अपने अंक में सहेज कर
घृणा,वेदना, प्रेम-सद्भावों का मोल
पाठ पढ़ाने जग को,
बताने रहस्य जीवन का
जीवन होता नहीं, कभी अधीर।
3 वर्ष पहले
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