आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

विविधता

                
                                                         
                            सौंदर्यबोध निज मन का
                                                                 
                            
होता कल्पित रूप
कोई पाषाण को देव समझता
कोई समझता पहाड़ रूप
दृश्य विचारों का न होता
कभी सदृष्य रूप
फिर भी साथ-साथ चलती सृष्टि
अपने अंक में सहेज कर
घृणा,वेदना, प्रेम-सद्भावों का मोल
पाठ पढ़ाने जग को,
बताने रहस्य जीवन का
जीवन होता नहीं, कभी अधीर।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर