विज्ञापन

श्रृंगार के रंग

Manoj Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह अश्रु नहीं श्रृंगार है
        
                                                    
                            
हृदय में उठा मृदुल
यादों का यह एक ज्वार है
जब कभी आए तुम
मेरे स्मित
दे गए बरबस मेरे अधरों पे
अनायास सहज हंसी
अनायास सहज हंसी।।

मेरे प्राणों में
सदा तुम बसते हो
अनुपस्थित रह कर भी
प्रेम के छंद पद
तुम मेरे लिए रचते हो
भाषित होता है, मुझे सदा ही
न जाने कब आकर! तुम
मुझे अपने रंग में रंग जाते हो
न जाने कब आकर! तुम
मुझे अपने रंग में रंग जाते हो।।

यह अश्रु नहीं श्रृंगार है
हृदय में उठा मृदुल
यादों का यह ज्वार है।।
- मनोज सिन्हा
 
एक वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

RATAN KUMAR

613 कविताएं

View Profile

Rajiv Tyagi

423 कविताएं

View Profile