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श्रृंगार के रंग

                
                                                         
                            यह अश्रु नहीं श्रृंगार है
                                                                 
                            
हृदय में उठा मृदुल
यादों का यह एक ज्वार है
जब कभी आए तुम
मेरे स्मित
दे गए बरबस मेरे अधरों पे
अनायास सहज हंसी
अनायास सहज हंसी।।

मेरे प्राणों में
सदा तुम बसते हो
अनुपस्थित रह कर भी
प्रेम के छंद पद
तुम मेरे लिए रचते हो
भाषित होता है, मुझे सदा ही
न जाने कब आकर! तुम
मुझे अपने रंग में रंग जाते हो
न जाने कब आकर! तुम
मुझे अपने रंग में रंग जाते हो।।

यह अश्रु नहीं श्रृंगार है
हृदय में उठा मृदुल
यादों का यह ज्वार है।।
- मनोज सिन्हा
 
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एक वर्ष पहले

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