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निर्मल निर्झर वनगामिनी

Manoj Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            झरने से झरती झर झर झर
        
                                                    
                            
बूंदों के सागर पत्थर पर
कानों में घोलती मधुमय स्वर
मन को नचवाती झंकृत कर
जैसे वीणा पर अपनी तर्जनी
फेरती वीणावादिनी,
निर्मल निर्झर वनगामिनी!
निर्मल निर्झर वनगामिनी!

धवल धूप से धवलित जल जल
श्वेत वसन सी झूलती उज्जवल
खींच खींच कर नयन नयन को
करती मुग्ध चंचल निश्छल
गीत मिश्रीमय घुलती पवन में
सांस लगे मनभावनी,
निर्मल निर्झर वनगामिनी!
निर्मल निर्झर वनगामिनी!

ऊर्जित जल कण गिरते तन पर
तन मन ऊर्जा पूर्णित भर-भर
लिपट गये तन दूध के चादर
नहा नहा मन नाचे नटवर
लगे कि अब वहीं करे बसेरा
शीतल सुधा सुख दायिनी,
निर्मल निर्झर वनगामिनी!
निर्मल निर्झर वनगामिनी!
एक घंटा पहले
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