झरने से झरती झर झर झर
बूंदों के सागर पत्थर पर
कानों में घोलती मधुमय स्वर
मन को नचवाती झंकृत कर
जैसे वीणा पर अपनी तर्जनी
फेरती वीणावादिनी,
निर्मल निर्झर वनगामिनी!
निर्मल निर्झर वनगामिनी!
धवल धूप से धवलित जल जल
श्वेत वसन सी झूलती उज्जवल
खींच खींच कर नयन नयन को
करती मुग्ध चंचल निश्छल
गीत मिश्रीमय घुलती पवन में
सांस लगे मनभावनी,
निर्मल निर्झर वनगामिनी!
निर्मल निर्झर वनगामिनी!
ऊर्जित जल कण गिरते तन पर
तन मन ऊर्जा पूर्णित भर-भर
लिपट गये तन दूध के चादर
नहा नहा मन नाचे नटवर
लगे कि अब वहीं करे बसेरा
शीतल सुधा सुख दायिनी,
निर्मल निर्झर वनगामिनी!
निर्मल निर्झर वनगामिनी!
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