जब आसान ना हो राह चुनना
जब शब्द ढूंढने लगे कोना
जब मस्तिष्क विस्मृत कर दे
जब हृदय का मंद हो स्पंदन
तब सुदूर आती ध्वनि पर
केन्द्रित करना चाहिए ध्यान
वहीं पर रोक देना चाहिए
मन की उड़ान ,क्योंकि आवश्यक है
आपसी तालमेल।
मस्तिष्क और हृदय के
मंथन से होता है नवीन विचारों
का उदय
और तब .. शब्द आसपास
विचरने लगते हैं,हृदय उल्लसित हो
बुनने लगता है, भावों की चारपाई
जहाँ मस्तिष्क आनन्दित होकर
एक –एक शब्द को वाक्य में
सहेज कर,बिखरे कलपुर्जों में
स्थापित कर सके तारतम्यता।
क्योंकि भावों एवं विचारों की
शुभता और सौम्यता रखती है
सम्पूर्ण दिग दिगंत को सुवासित
करने की अपार क्षमता।
-मंजुला चौधरी