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उसका स्वाभिमान

Manju Anand

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उसका स्वाभिमान दहाड़े मार कर रोता रहा,
        
                                                    
                            
वो हँसता रहा महफिल मे खिलखिला कर,
आँखों से बर्दाश्त नही हुआ,
तो आँसू छलकाने लगीं,
पौंछने लगा वह छलकते आँसू छुपछुपा कर,
बेखबर नही मजबूर था हालात के हाथों,
रौंद कर अपने पैरों तले अपना स्वाभिमान,
ना चाहते हुए भी शामिल हो गया,
वो फिर एक बार इस महफिल मे,
जब तक रहा दर्द भी शर्माता रहा,
दूर से ही उसे निहारता रहा,
सुना कोई कह रहा था,
बड़ा ही बेगैरत है यह इंसान,
होश मे था फिर भी लड़खड़ा गया,
हालातों के हत्थे चढ़ गया,
महफिल मे तमाशा बन गया,
कोई समझ ना सका,
उसका स्वाभिमान दहाड़े मार कर रोता रहा।
2 वर्ष पहले
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