एक वादा खुद से खुद कर लिया मैंने।
सपनों को पूरा करने के लिए मैंने।
थोड़ा-थोड़ा जग लिया मैंने।
माना आदत बनने में थोड़ा वक्त लगेगा।
पर थोड़ा-थोड़ा करने की आदत को।
अब अपनी आदत कर लिया मैंने।
लक्ष्य के पर्वत पर थाम आशाओं की रस्सी।
मन में धीर का शस्त्र धारण कर।
धीमें-धीमें चढ़ाना शुरू कर दिया मैंने।
यकीन है दुआएं साथ हैं मेरे अपनों की।
कर्म की बदौलत मंजिल पर पहुंच जाने का।
नसीब में ना हो उसे भी हासिल कर दिखाने का।
सफलता देख ले तू खुद मुझे।
तेरे साथ एक दिन मेरी गुफ्तगू होगी
तेरी चौकट पर दस्तक देना शुरू कर दिया मैंने।
- मनीष शाक्य।
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