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तकरार

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरी और उसकी बस इतनी सी तकरार है,
        
                                                    
                            

मेरी हां में उसकी ना है,
उसकी ना में मेरी हां है,

हम दोनों में शायद ये उम्र भर का करार है।

वो समझती की मैं नहीं समझता,
मै समझता की वो नहीं समझती,

समझना एक दूजे को नागवार है,

बस इतनी सी ही, तकरार है।

बहुत कम होती है, बात चित
बिना बोले महीने जाते हैं, बीत,

हम दोनों ने मान लिया है, इसे ज़िन्दगी की रीत,
दिखती नहीं कभी भी, जाने वो कौन सी दरार है,

मेरी और उसकी बस इतनी सी तकरार है,

एक ही बिस्तर पर सोते हैं, बीच में होता है, तकिया
जागता वो है, रात भर, सोती नहीं, मेरी भी अंखियां,

बंद कमरे में जिंदा लेटे, दो मजार है।

अहम के टकराव में, रिश्ते हुए तार,तार है,
एक दूजे के साथ की, रही नहीं अब दरकार है....
एक वर्ष पहले
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Rabindra Aman

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