खोट नहीं है उसमें लेकिन, घर वाले निकालते खामी,
दिन, भर फिरता मारा मारा, कहते उसे, गृह स्वामी।
विकृत तन की दशा है उसकी,
हृदय पे बोझ है, मानो सौ मन की,
बैठ नहीं पाता है, दो पल
नित्य, निरंतर गामी,
वो है, गृह का स्वामी!
सबकी जिम्मेदारी, उसके सर
मन, मस्तिष्क से, वो है, निडर,
पूरी करता, सबकी इच्छा,
चाहे मांगनी, पड़े उसे भिक्षा,
स्वयं का वो सह लेता, अपमान
घर की पर, रख लेता मान,
निष्ठा, समर्पण, देख के उसका, देव भी करते, नमामि,
धन्य! हे विराट हृदय! गृह स्वामी।