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दुनिया एक बाजार

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रिश्ते मिलते, गली,मोड़ पर
        
                                                    
                            
मिलते नहीं खरीदार।

मोल भाव हर चीज में होती,
बिकते हर किरदार।

भोग, विलास की तृष्णा में
लुट जाते हैं, पगार ,

फांके में फिर दिन कटते हैं,
आदत से हैं, लाचार।

सद्व्यवहार की कीमत ऊंची,
सस्ता है, अनाचार,

कम कीमत में कर ले, गुजारा
वही यहां, समझदार।

ऊंचे ऊंचे वादे बिकते,
पक्का नहीं करार,
वादों पे जो करे भरोसा
सबसे बड़ा, गंवार।

रूप, लावण्य की चाहत में,
सब कुछ जाते हार,

दानी, याचक बनके फिरते
यही बाजार का सार।
एक वर्ष पहले
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Rabindra Aman

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