छतें देखती हैं अपने कोनों किनारों से
कुछ उचक कर कभी उछलकर
सुना है जब से घरों में मंज़िलें बढ़ीं
छतें छोटी हो गयीं
साथ ही छोटे हो गये वो सपने
जो छत पर पला करते थे
यही खेल खेलते वक़्त हम
घुटनों के बल चला करते थे
गर्म रातों को जुगनू देखने की आरज़ू में
हम बिजली गुल होने की दुआ करते थे
यही नानी की कहानियों के
हम शहजादे हुआ करते थे।
यही नजर के मिलने हटने और फिर मिलके
एक मुस्कुराहट में बदलने में जवां प्यार पनपते थे
आशिक किताबों में छिपाकर अपनी शक्ल
दिन रात मासूका का नाम जपते थे
वक़्त लगता था गीले कपड़ों को तारों में लटकने में
लूटते थे दिल हसीं चेहरे भीगी जुल्फ झटकने में
जहाँ चाँद हर रात डाकिया बनकर खत पहुंचाता था
होता था दिन पूरा जब महबूब नजर आता था।
वो छत मुझे अब वीरान नजरों से देखती है
कुछ बरस हुए मुंह से लहू फेंकती है
उग आए हैं उसपे कुछ बबूल कांटे
सांसें उसकी अब चलते हुए फूलने लगती है
मैं सोचता हूँ जो किसी रोज एक पतंग
जिसपे लिखी हो एक मोहब्बत की ग़ज़ल
कहीं से कट कर गिर आए छत पर
और छत की नब्ज जुड़ जाए
साँस फिर से चलने लगे और
प्यार फिर से पलने लगे...
- मनीष पाण्डेय 'आशिक'
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