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आंखों की भूख

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उसकी आंखों में भूख है,
        
                                                    
                            
गरीबी की पराकाष्ठा, विरल दुख है,

हर चीज को देखता है, आंखे फाड़कर
हृदय में पता नहीं, क्या रखा है, गाड़ कर,

हलवाई की दुकान पे खड़ा रहता है
भगाएं कोई कितना भी अड़आ रहता है,

मांगता नहीं, बस देखता है,
हर खाने की वस्तु को, निरखता है,

पथरीली आंखे, जीर्ण शीर्ण काया,
प्रतीत होता है, बरसों से नहीं नहाया,

मां मरी है कुछ दिन पहले,
बाप का पता नहीं है,
इसलिए उसके मुंह में,
जमा दही है,

कोई कुछ दे दे तो,
जानवर की तरह खाता है, नोचकर
डर लगता है, उसे खाते देखकर,

सुबह को एक दिन, हलवाई की दुकान पर भीड़ खड़ी थी,
वहां किसी इंसान की लाश पड़ी थी,

वही अभागा था, भुक्कड़
निकल गई थी, उसके भूख की अकड,

उसके खुली आंखे मानो, बता रही थी,
भूख से नहीं, भूख के डर से मरा, समझा रही थी।।

दस, बारह की उम्र भी क्या उम्र है, मरने की,
क्रूर प्रारब्ध को भी क्या जल्दी थी, उसके प्राण हरने की।।
एक वर्ष पहले
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