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आचमन प्रीत की

Manish Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नींद से बोझिल आंखे सो नहीं पातीं,
        
                                                    
                            
विरह! व्यथा! ऐसी, की, रो नहीं पाती।

विगलित हृदय, तेज स्पंदन
अंतर में, मचा है क्रंदन,

मुख मलिन, दशा, दीन हीन,
चारों पहर, हृदय है, खिन्न,

शूल सी चुभती, शाम की बेला
प्रिय बिछोह! अब जाए न झेला,

तपती देह, विरह की अग्नि
उद्विग्न कटती, नित्य ही रजनी,

मिलन की तुमसे, आस, प्रिए!
प्रति दिन, विष कोई कैसे पीए,

अंतिम है, ये प्रणय निवेदन
प्रीत की समझो, इसको आचमन
एक वर्ष पहले
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Rabindra Aman

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