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फिर पेड़ लगाएंगे:.....पेड़ की पीड़ा

Mamta Tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपना दर्द बयां करूं किससे
        
                                                    
                            
रोता हूं
दर्द दिखाऊं कैसे
मानव मन समझ नहीं पाया मैं
अपना जीवन लूटा कर भी दर्द पाया मैं
शीतलता देना मेरा गुनाह है
तो हां मैं गुनाह करता हूं
किसी के लिए जीना गुनाह है
तो यह गुनाह में करता हूं
छांव,फल, फूल,हवा
देना गुनाह है तो
ये गुनाह मैं करता हूं
औषधि के काम आता
स्वच्छ ऑक्सीजन देता
क्या-क्या गिनवाऊं
अपने मुंह से अपना बखान नहीं करता मैं
इंसानों के हाथों में
कुल्हाड़ी देख डर जाता हूं
अपनी व्यथा किससे सुनाऊं
मौन हो जाता हूं
खैर, जो इंसानों की मर्जी
जब अपना विनाश करने पर तुले हैं
तो मैं क्या कर सकता हूं
करके मेरा विनाश खुद को बचा ना पाएंगे
एक दिन मेरी छांव के लिए
तड़प- तड़प कर मर जाएंगे
हमारे बिना महलों में क्या
कही भी चैन, सुकून नहीं पाएंगे
आखिर में ढूंढेंगे हमको ही,
जिंदगी के लिए फिर पेड़ लगाएंगे।।
-ममता तिवारी
2 महीने पहले
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