अपना दर्द बयां करूं किससे
रोता हूं
दर्द दिखाऊं कैसे
मानव मन समझ नहीं पाया मैं
अपना जीवन लूटा कर भी दर्द पाया मैं
शीतलता देना मेरा गुनाह है
तो हां मैं गुनाह करता हूं
किसी के लिए जीना गुनाह है
तो यह गुनाह में करता हूं
छांव,फल, फूल,हवा
देना गुनाह है तो
ये गुनाह मैं करता हूं
औषधि के काम आता
स्वच्छ ऑक्सीजन देता
क्या-क्या गिनवाऊं
अपने मुंह से अपना बखान नहीं करता मैं
इंसानों के हाथों में
कुल्हाड़ी देख डर जाता हूं
अपनी व्यथा किससे सुनाऊं
मौन हो जाता हूं
खैर, जो इंसानों की मर्जी
जब अपना विनाश करने पर तुले हैं
तो मैं क्या कर सकता हूं
करके मेरा विनाश खुद को बचा ना पाएंगे
एक दिन मेरी छांव के लिए
तड़प- तड़प कर मर जाएंगे
हमारे बिना महलों में क्या
कही भी चैन, सुकून नहीं पाएंगे
आखिर में ढूंढेंगे हमको ही,
जिंदगी के लिए फिर पेड़ लगाएंगे।।
-ममता तिवारी
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