भावनाओं की खुशबू को
छू कर आ रही कविता
बनावटी रंगों की खुशबू नहीं
दिल को छूती हुई गुजर जाएगी
राहों के कंकड़ पत्थर से टकराती
हौसलों के रंग में रंगी हुई
फूल सी नाज़ुक भी है
हिमालय जैसी हिम्मतवाली
चंद ठोकरों से डरती नहीं
बुलंद इरादों का पोशाक पहनी हुई
बाधाओं को बल समझती
परेशानियों को पुरस्कार
पर्वत जैसे विघ्नों को
समझती तिनके समान
आग जैसी तपन इसमें
नीर जैसी शीतलता
बहती शीतल हवाओं जैसी
जीने की सिखाती सलीका
मन की है निर्मल बहुत
कमसिन कोमल कुसुम सी
हर्ष का गुलाब हाथ में देकर
हंसती-हंसाती है कलियों सी।।
-ममता तिवारी