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कुछ हासिल नहीं

Mamta Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            फ़िक्र नहीं रक़ीब की वो तो बहतेरे हैं
        
                                                    
                            
तलाशते हैं अहबाब को जो नहीं मेरे हैं,

ग़लतफ़हमी थी कि फ़क़त वो रहनुमा हमारे हैं
अंदाज़ा न था कि उनके नज़दीक रहनुमाओं की कतारें हैं,

ज़माना हिमायती है ये महज़ बहाने हैं
वो नामुराद हैं जो इस ज़माने के सहारे हैं,

मौकापरस्त हैं वो ये ख़बर थी दिमाग़ को हमारे
ख़ुद के इस्तेमाल की ख़बर नहीं थी दिल को बेचारे,

पत्थरों पर सर पीटने से कुछ हासिल नहीं दिलनशीं प्यारे
पत्थर को पिघलाने का दम रखो हबीबी सारे के सारे ।
- ममता सिंह देवा 
एक वर्ष पहले
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