आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कुछ हासिल नहीं

                
                                                         
                            फ़िक्र नहीं रक़ीब की वो तो बहतेरे हैं
                                                                 
                            
तलाशते हैं अहबाब को जो नहीं मेरे हैं,

ग़लतफ़हमी थी कि फ़क़त वो रहनुमा हमारे हैं
अंदाज़ा न था कि उनके नज़दीक रहनुमाओं की कतारें हैं,

ज़माना हिमायती है ये महज़ बहाने हैं
वो नामुराद हैं जो इस ज़माने के सहारे हैं,

मौकापरस्त हैं वो ये ख़बर थी दिमाग़ को हमारे
ख़ुद के इस्तेमाल की ख़बर नहीं थी दिल को बेचारे,

पत्थरों पर सर पीटने से कुछ हासिल नहीं दिलनशीं प्यारे
पत्थर को पिघलाने का दम रखो हबीबी सारे के सारे ।
- ममता सिंह देवा 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर