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ज़िंदगी कब अपना

mamta singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जैसे हर मोड़ पे नयी सड़क जुड़ जाती है,
        
                                                    
                            
ज़िंदगी रोज़ एक नया सबक सिखाती है।
हम ख़ुद ही बने रहते हैं लकीर के फ़कीर,
ज़िंदगी कब अपना खोया हक़ दोहराती है।
एक वर्ष पहले
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