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ग़ज़ल

Mamta Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुझ को मेरी मंज़िल से मिला क्यूँ नहीं देते
        
                                                    
                            
बतलाएँ हुज़ूर अपना पता क्यूँ नहीं देते

जज़्बात के शोलों को हवा क्यूँ नहीं देते
तुम आग मुहब्बत की लगा क्यूँ नहीं देते

जब आप को बे इंतिहा मुझ से है मुहब्बत
फिर हाथ मेरी सम्त बढ़ा क्यूँ नहीं देते

निकले हैं शरर हो के जो आँखों से ये आँसू
ज़ुल्मत के दिये इनको बना क्यूँ नहीं देते

जो मेरी हया की है अलामत मेरे सर पर
परचम इसी पल्लू को बना क्यूँ नहीं देते

होंटों पे मेरे लिख के तबस्सुम की इबारत
आँसू मेरी पलकों के मिटा क्यूँ नहीं देते

हाँ हम से वफ़ा करने की ग़लती हुई साहिब
मुज़रिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते

है आप के इस दिल में मुझे बसने की हसरत
इक कोने में मुझ को भी जगह क्यूँ नहीं देते

तू भूल जा मुझ को के मुझे तुझ से है नफ़रत
ये बात उसे आप बता क्यूँ नहीं देते

ये "नाज़" ये अंदाज़ नहीं मिलते किसी में
तुम ख़ुद को कोई रंग जुदा क्यूँ नहीं देते
-ममता गुप्ता "नाज़"
 
2 वर्ष पहले
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