आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ग़ज़ल

                
                                                         
                            मुझ को मेरी मंज़िल से मिला क्यूँ नहीं देते
                                                                 
                            
बतलाएँ हुज़ूर अपना पता क्यूँ नहीं देते

जज़्बात के शोलों को हवा क्यूँ नहीं देते
तुम आग मुहब्बत की लगा क्यूँ नहीं देते

जब आप को बे इंतिहा मुझ से है मुहब्बत
फिर हाथ मेरी सम्त बढ़ा क्यूँ नहीं देते

निकले हैं शरर हो के जो आँखों से ये आँसू
ज़ुल्मत के दिये इनको बना क्यूँ नहीं देते

जो मेरी हया की है अलामत मेरे सर पर
परचम इसी पल्लू को बना क्यूँ नहीं देते

होंटों पे मेरे लिख के तबस्सुम की इबारत
आँसू मेरी पलकों के मिटा क्यूँ नहीं देते

हाँ हम से वफ़ा करने की ग़लती हुई साहिब
मुज़रिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते

है आप के इस दिल में मुझे बसने की हसरत
इक कोने में मुझ को भी जगह क्यूँ नहीं देते

तू भूल जा मुझ को के मुझे तुझ से है नफ़रत
ये बात उसे आप बता क्यूँ नहीं देते

ये "नाज़" ये अंदाज़ नहीं मिलते किसी में
तुम ख़ुद को कोई रंग जुदा क्यूँ नहीं देते
-ममता गुप्ता "नाज़"
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर