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माँ - मैं तुम बन जाती हूँ

mamta devi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं
        
                                                    
                            
तुम बन जाती हूँ
कई बार
जब मैं
वही काम करती हूँ
जो अक्सर
तुम क्या करती थी।
अनजाने
अनायास
याद आ जाता है
मुझे तुम्हारे हाथ का स्वाद
जो पहले
सामान्य लगता था
अब खास हो गया है।
आँखों के सामने
प्रत्यक्ष हो उठता है
तुम्हारा मुस्कुराता बिंब
उस समय लगता है
जैसे
ये हाथ मेरे नहीं
तुम्हारे हैं
मेरा तो कुछ अंश ही
मेरा है
जो कि
तुम्हें अनुभव कर रहा है
बाकी तो संपूर्ण मैं
तुम बन जाती हूँ
जब भी प्रत्यक्ष
हो उठती हो मेरे समक्ष
तुम मुझमें समा जाती हो।
तुम्हारी
आँखों की चमक,
चेहरे की आभा,
होठों की मुस्कान,
मेरी आत्मा को
शीतल करती है
आनंदित होता है
मेरा हृदय कि
तुम जहाँ भी हो खुश हो
तुम्हारी समीपता
मुझे सहारा देती है।
एक वर्ष पहले
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