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माँ - मैं तुम बन जाती हूँ

                
                                                         
                            मैं
                                                                 
                            
तुम बन जाती हूँ
कई बार
जब मैं
वही काम करती हूँ
जो अक्सर
तुम क्या करती थी।
अनजाने
अनायास
याद आ जाता है
मुझे तुम्हारे हाथ का स्वाद
जो पहले
सामान्य लगता था
अब खास हो गया है।
आँखों के सामने
प्रत्यक्ष हो उठता है
तुम्हारा मुस्कुराता बिंब
उस समय लगता है
जैसे
ये हाथ मेरे नहीं
तुम्हारे हैं
मेरा तो कुछ अंश ही
मेरा है
जो कि
तुम्हें अनुभव कर रहा है
बाकी तो संपूर्ण मैं
तुम बन जाती हूँ
जब भी प्रत्यक्ष
हो उठती हो मेरे समक्ष
तुम मुझमें समा जाती हो।
तुम्हारी
आँखों की चमक,
चेहरे की आभा,
होठों की मुस्कान,
मेरी आत्मा को
शीतल करती है
आनंदित होता है
मेरा हृदय कि
तुम जहाँ भी हो खुश हो
तुम्हारी समीपता
मुझे सहारा देती है।
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एक वर्ष पहले

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