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ज़िंदगी, तुझसे शिकायत नहीं

MAHENDRA SINGH

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लिखता हूँ मैं ज़िंदगी की हकीकत,
        
                                                    
                            
स्याही में अपने दर्द घोलकर।
कुछ ख़्वाब दफ़्न हैं सीने में,
कुछ अश्क छुपे हैं होंठों को खोलकर।
खुशियों का साथ मुकद्दर में कम था,
ग़मों ने मगर हाथ थाम लिया।
जब अपनों की पहचान की बारी आई,
वक्त ने हर चेहरा बेनक़ाब किया।
कम उम्र में ही इतना सीखा,
जितना लोग उम्र भर नहीं सीख पाते।
मैंने मुस्कुराहटों के पीछे छिपे,
हज़ारों दर्दों को करीब से देखा है।
ठोकरों ने गिराया बार-बार,
मगर हौसलों ने हार न मानी।
ज़ख्मों ने जिस्म को तोड़ा होगा,
पर मेरी रूह आज भी है रवानी।
मैंने ज़िंदगी की बेवफ़ाई को भी,
दिल से अपनी वफ़ा समझा।
जिसने जो दिया, उसे कबूल किया,
किसी से न कोई हिसाब रखा।
अब आईने में खुद को देखता हूँ,
तो एक अजनबी नज़र आता है।
जिसके चेहरे पर मुस्कान तो है,
पर भीतर हर रोज़ कुछ मर जाता है।
ऐ ज़िंदगी! अब और क्या आज़माएगी मुझे,
मैं हर इम्तिहान से गुज़र चुका हूँ।
जो बचा है मेरे वजूद में आज,
उसे भी तेरे नाम कर चुका हूँ।
न कोई शिकायत, न कोई गिला,
बस एक आख़िरी पैग़ाम होगा।
जिस दिन थककर आँखें बंद होंगी,
वहीं मेरा सच्चा आराम होगा।
अगर मेरी साँसें किसी के काम न आईं,
तो मेरी राख ही दुआ बन जाए।
जिस चिराग़ को रोशनी की तलाश हो,
मेरी मिट्टी उसका दिया बन जाए।
मैं हारा नहीं हूँ ऐ ज़िंदगी,
बस अब लड़ने की चाह नहीं।
तू जीत भी जाए तो क्या हासिल,
मेरे पास खोने को कुछ रहा नहीं।
— महेंद्र सिंह रावत
9 घंटे पहले
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