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छोड़कर इनका दामन, अब अपना आंगन सजाना है।

MAHENDRA SINGH

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज से कोई स्टेटस नहीं होगा,
        
                                                    
                            
जिस दिन होगा, ज़ोरों से होगा।
हर तरफ़ बस अपना ही शोर होगा।
मंज़िल न मिली किस्मत के भरोसे, न सही,
अब तलाश नहीं होगी, ख़ुद मंज़िल दर पर होगी।
है यक़ीन ख़ुद पर इतना, कि ख़ुदा भी विवश होगा। किस शख़्सियत से पाला पड़ा है, जो ख़ुद चट्टान-सा खड़ा है।
गुरूर नहीं, ये बात आत्मसम्मान की है।
जागा हूँ मैं अभी तो,
बस ये तो शुरुआत है।
बहुत हुआ रोना-धोना, बिलखना,
ये सारी निशानियाँ कायरता की हैं।
छोड़कर इनका दामन, अब अपना आंगन सजाना है।
चल पड़े हैं हम अकेले ही मंज़िल को पाने,
अब अकेले ही सब करके दिखलाना है।
18 घंटे पहले
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