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छोड़कर इनका दामन, अब अपना आंगन सजाना है।

                
                                                         
                            आज से कोई स्टेटस नहीं होगा,
                                                                 
                            
जिस दिन होगा, ज़ोरों से होगा।
हर तरफ़ बस अपना ही शोर होगा।
मंज़िल न मिली किस्मत के भरोसे, न सही,
अब तलाश नहीं होगी, ख़ुद मंज़िल दर पर होगी।
है यक़ीन ख़ुद पर इतना, कि ख़ुदा भी विवश होगा। किस शख़्सियत से पाला पड़ा है, जो ख़ुद चट्टान-सा खड़ा है।
गुरूर नहीं, ये बात आत्मसम्मान की है।
जागा हूँ मैं अभी तो,
बस ये तो शुरुआत है।
बहुत हुआ रोना-धोना, बिलखना,
ये सारी निशानियाँ कायरता की हैं।
छोड़कर इनका दामन, अब अपना आंगन सजाना है।
चल पड़े हैं हम अकेले ही मंज़िल को पाने,
अब अकेले ही सब करके दिखलाना है।
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8 घंटे पहले

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