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गजल

Lalita Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जानें क्यूं लोग दिखाते बहुत हैं
        
                                                    
                            
मतलबी हैं जमाना जताते बहुत हैं

छल और कपट से भरा हुआ है दिल
सामने वो मिलकर बहलाते बहुत हैं

दूसरों के दुख में देखते हैं तमाशा
अपनी बारी में छिपाते बहुत हैं

हजम होती नहीं दूसरों की सुखी जिन्दगी
बात बात पे टांग अड़ाते बहुत हैं

कहाँ से लाते हैं ये झूठे शब्दों की मिठास
मैं जानती हूँ ऐसे शब्दों से वे चुभाते बहुत हैं

क्यों न ऐसे लोगों से कर ले किनारा
जिन्दगी सुख से काटने के लिए आशाएं बहुत है

छोड़ो न कोई भी पल खुशियाँ बाँटने की
वरना जीवन में रोने के लिए फंसाने बहुत हैं

जीवन के एक एक लम्हें को हंसकर जी ले
वरना जीवन में लोग पछताते बहुत हैं

हमें तो आदत है सबसे हिल मिल जाने की
पता नहीं लोग क्यूं कतराते बहुत हैं
डॉ ललिता यादव
बिलासपुर छत्तीसगढ़


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