जानें क्यूं लोग दिखाते बहुत हैं
मतलबी हैं जमाना जताते बहुत हैं
छल और कपट से भरा हुआ है दिल
सामने वो मिलकर बहलाते बहुत हैं
दूसरों के दुख में देखते हैं तमाशा
अपनी बारी में छिपाते बहुत हैं
हजम होती नहीं दूसरों की सुखी जिन्दगी
बात बात पे टांग अड़ाते बहुत हैं
कहाँ से लाते हैं ये झूठे शब्दों की मिठास
मैं जानती हूँ ऐसे शब्दों से वे चुभाते बहुत हैं
क्यों न ऐसे लोगों से कर ले किनारा
जिन्दगी सुख से काटने के लिए आशाएं बहुत है
छोड़ो न कोई भी पल खुशियाँ बाँटने की
वरना जीवन में रोने के लिए फंसाने बहुत हैं
जीवन के एक एक लम्हें को हंसकर जी ले
वरना जीवन में लोग पछताते बहुत हैं
हमें तो आदत है सबसे हिल मिल जाने की
पता नहीं लोग क्यूं कतराते बहुत हैं
डॉ ललिता यादव
बिलासपुर छत्तीसगढ़
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