आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गजल

                
                                                         
                            जानें क्यूं लोग दिखाते बहुत हैं
                                                                 
                            
मतलबी हैं जमाना जताते बहुत हैं

छल और कपट से भरा हुआ है दिल
सामने वो मिलकर बहलाते बहुत हैं

दूसरों के दुख में देखते हैं तमाशा
अपनी बारी में छिपाते बहुत हैं

हजम होती नहीं दूसरों की सुखी जिन्दगी
बात बात पे टांग अड़ाते बहुत हैं

कहाँ से लाते हैं ये झूठे शब्दों की मिठास
मैं जानती हूँ ऐसे शब्दों से वे चुभाते बहुत हैं

क्यों न ऐसे लोगों से कर ले किनारा
जिन्दगी सुख से काटने के लिए आशाएं बहुत है

छोड़ो न कोई भी पल खुशियाँ बाँटने की
वरना जीवन में रोने के लिए फंसाने बहुत हैं

जीवन के एक एक लम्हें को हंसकर जी ले
वरना जीवन में लोग पछताते बहुत हैं

हमें तो आदत है सबसे हिल मिल जाने की
पता नहीं लोग क्यूं कतराते बहुत हैं
डॉ ललिता यादव
बिलासपुर छत्तीसगढ़


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर