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अपने आप में अंधेरा

Lalit Dadhich

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम दर बदर भटक रहे हैं कहीं रहना नहीं चाहते,
        
                                                    
                            
दुनिया के काम में शामिल है पर करना नहीं चाहते,
सब यही कहते हैं कि सुधार का काम मेरा नहीं है,
अपने होने की चिंता कर रहे हैं कीचड़ से निकलना नहीं चाहते,
पांव में घायल छाले फूट रहे हैं ज़ख्म बहना नहीं चाहते,
आदमी कितना बुरा है सामने की तादाद बता सकती है,
पर किसी के हृदय में फूल रखना नहीं चाहते,
पैसा शौहरत को जिंदगी मान लिए हैं इंसान जिंदा रहना नहीं चाहते,
हमें आज भी लगता है करुणा सत्य सबके मन में उछल रहे हैं,
लेकिन ये पता है अपने आप से कमजोर रूहें कठोर पत्थरों से निकलना नहीं चाहते,
कब तुम 'ललित' रोशनी के साथ बहना चाहते हो,
अब अंधेरे अपने आप में अंधेरा नहीं चाहते।।
- ललित दाधीच
2 घंटे पहले
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