बहुत ज़ोर से चल रहा था,
संचालक की सूची
में मेरा भी नाम था।
बहुत से कवि आए थे,
कुछ लोग छूट गए थे,
उनके भी नाम जोड़े जा रहे थे।
संचालक थोड़ा कन्फ्यूज हो गया,
किस क्रम में किसको बुलाऊँ,
कुछ देर वह स्तब्ध रह गया।
बीच-बीच में सिफ़ारिश
आ जाती थी -
इन्हें काम पर जाना है,
कोई अपने बच्चों को घर छोड़कर
आए हैं, इनकी कविता पहले
की उद्घोषणा कर दें।
वैसे लोगों को एक ही
कविता पढ़नी थी,
पर एक बार मंच पर
चढ़ गए तो दो-दो
कविताएँ पढ़कर ही छोड़ते थे।
मंच, श्रोता सब वही रहे
जिन्हें जिनकी बारी
आनी थी।
कई बार मेरे साथी ने
संचालक से कहा -
'परिमल' को तो बुलाओ,
पर संचालक
भला क्या करता,
सिफ़ारिशों की बड़ी लिस्ट थी।
मेरा जब नम्बर आया
तो सब दर्शक चले गए थे,
बस टेंट वाले, माइक वाले
और सामान इकट्ठा
करने वाले ही रह गए थे।
घर जब देर से पहुँचा,
श्रीमती जी परेशान हो रही थीं,
आते ही कहा -
“अब आप यदि कवि सम्मेलन
में जायेंगे तो मैं आत्महत्या
कर लूँगी।”
-लक्ष्मण झा परिमल