मन कहाँ स्थिर रहता है,
जब उद्विग्नता के जालों में फँस जाता है,
मानस पटल पर कल्पनाओं की फुहारें
अंगड़ाइयाँ लेने लगती हैं।
निःशब्द, शांत परिधियों में
कागज़, कलम, दवात निकल आते हैं!
कविता की सुंदर रूपरेखा और
एक अद्भुत छवि उभरने लगती है।
शब्दों के श्रृंगार से उसके रूप सजाते हैं,
रंग-बिरंगे परिधानों से एक मूर्त रूप देते हैं!!
पर उम्र का एहसास हमारी
शृंगारिक कविता से दूर हो गया।
अब मन बावला प्रकृति के
आँचल में मधुप बन गया।
कमलिनी के पलक में
कविता का सृजन करने लगा।
किसी ने जोर से आवाज़ दी —
हमारी कविता अधूरी रह गई।
श्रृंगार और प्रकृति, दोनों बहनें हमसे
रूठकर न जाने कहाँ चली गईं?