शहर से सुन्दर गांव,
देश का कुन्दन गांव।
ऊंचे बरगद मोटे पीपल,
कोयल की आवाज गौरैया राग,
कितना शीतल गांव।
मेहनत कठिन परिश्रम का प्रतीक,
हर देश का गांव शहर को देता भीक।
शहरों की चिन्ता गांव में नहीं चिंता,
जातिय गुमान ठहरा बेईमान चेहरा,
फिक्र किसे गरीब योजनाओं की चिता है,
कहां कैसे देश बंटा गांव आज भी छोटा है।
जय जवान जय किसान अब कौन कहता है,
आज शहर में पैदा होने वाला मामडैड कहता है,
वह गांव हमारा ठीक जहां मातापिता जिंदा हैं।
संजीव रामपाल मिश्र "बाबा"
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