वह औरत
टूटे दाँत, सफ़ेद बाल
टेढ़ा मुँह, पेंग्विन चाल
-अरे बेचारी, बूढ़ी औरत!
-वह डाॅक्टर है,जानते हो?
-आप डाॅक्टर हैं, नमस्ते जी।
किस हिस्से की डाॅक्टर हैं?
-मतलब ?
-आँख की, कान की, हड्डी की?
-नहीं, सब हिस्सों की।
डाॅक्टरी सब हिस्सों की सिखाई जाती है।
सारे शरीर की सिखाई जाती है।
-जनाना इलाज तो कर लेती होंगी?
-नहीं।
उसने उतना ही टेढ़ा मुँह बिचकाया,
जितना मैंने गाईनी हाऊस जाब और पी जी डिपलोमा सीट मिलने पर बिचकाया था।
-तो किसी हस्पताल में थीं क्या?
-मेडिकल कॉलेज समझाने से बेहतर लगा संबंधित हस्पताल का नाम बताना।
-सरकारी था ?
-नहीं ।
-पेंशन मिलती है ?
-नहीं।
लगा कुनैन डाल दी हो उसके मुँह में किसी ने।
बेचारी औरत वाला भाव फिर से पसरने लगा था।
-अच्छा, तो तुम नर्स थीं!
-नहीं
-फिर ?
-पढ़ाती थी।
जी वाला भाव लगभग उड़नछू हो चुका था।
जबान पर आया कसैला स्वाद गटकता बोला
-ओह! तुम टीचर थी।
क्या पढ़ाती थी ?
बेशर्म बेहया सेजल पवार की बेहूदगी से आहत,
क्या पढ़ाती थी, बताने से अधिक सुविधाजनक लगा, यही कहना,
-हाँ टीचर थी।
-डाॅक्टर! टीचर! डाॅक्टर!
-तुम्हारे भी टीचर होंगे,
कुछ सिखाया होगा।
गुरु पूर्णिमा निकल गई है,
अध्यापक दिवस आ रहा है।
साल में एक बार ही सही उनके
योगदान पर आभार जता दो।