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चाय 'चाह'

kumud dharwal

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                            'चाय'
        
                                                    
                            
'चाह'
पंजाबियां दी शान ही वखरी है।
कितना भावमयी शब्द है यहाँ 'चाह'।
चाह पीने की चाह जब उठती है,
यह तलब रोके नहीं रुकती है।
बचपन में चाय के साथ एक दुराव जुड़ा था।
बच्चे चाय नहीं पीते।
क्यों?
लत लग जाती है।
डराया जाता था उन्हें काले रंग के हो जाओगे।
उस देश में जहाँ एक अभिशाप है काला होना।
वहाँ कौन चाहेगा काला होना।
हालाँकि उल्टा है यहाँ दिल के मामले में।
वहाँ कोई दिक्कत नहीं है काले, लाल या पीले होने में।
तब छुप कर एक कप पीते थे।
जिस काम से रोका जाए वही काम छिप कर करने में,
ऐवरेस्ट फतह करने वाली फीलिंग होती थी।
साल बढ़ते गए, चाय के कप भी बढ़ते गए।
एक, दो, तीन---दस।
वजहें बुन ली गई थीं, तलब उठने पे बिन वजह भी पी लेते थे बस।
दो टुक
कभी गमे तन्हाई में पाने को साथ,
कभी महफिल के हमसफरों का पाने को साथ,
पी लेते थे।
यानी फीलिंग्स के लिए पीते थे।
अब बुढ़ापे में भी पी रहे हैं।
हाँ वजह अभी भी हैं, कुछ डरपोक हो गई हैं।
कुछ लम्बे चौड़े शब्दों के जाल चहुँ और कस गए है।
यदा कदा फन उठाए डराने लगे हैं।
चीनी, डायबिटीज तन दूर से ही बाय बाय करने लगता है।
कैफीन, न भई न, दिल ढोलक की थाप सा बजने लगता है।
कोलेस्ट्राल, सारा वजूद ही लिजलिजाने लगता है।
केंसर ओह! कालिया नाग इधर आता हुआ लगता है।
चाय की चाह उतनी ही है,
पर अब नहीं कप दस,
एक--आधा---और आधा बस।
एक गिल्टी सी फीलिंग अब आने लगी है।
 
8 घंटे पहले
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